उमरिया और अमल

 लिखना पड़ना जानना

समझना

याद रखना फिर उस पर अमल करना

टेड़ा सवाल है

हम लिख सकते हैं हम पड़ सकतें हैं

समझ सकते हैं

पर अमल करने वाले बात

पीढ़ी दर पीढ़ी उपेक्षा कि शिकार हैं

इससे क्या लिखना 

क्या समझना

क्या पड़ना क्या जानना

क्या याद रखना

सब बकवास हो गया है ।

उमरिया कैसे गुजरी

कब और कहां से गुजरी

यह तो उमरिया कि डायरिया 

ही बता सकती है

पर यह सच है कि

उमरिया तो आधी गुजर गयी

शायद आधी रह गई

पर आज इस समय 

इस और इसे देखने कि

इसे जानने कि 

हमें फुर्सत नहीं है 

सब उमरिया गुजार दे रहे

पर अपने मन के मकड़जाल में

माया रानी के नखरों

और तेवरों के 

दुश्चक्र में फंसे

सुन्दरता के

आकर्षण में खोए

ममता मोह स्नेह जैसे

बेफजूल पहाड़ों जैसे

घाटियों में कि ढलानों में 

चढ़ते उतरते

उमरिया गुजर जाती

मौत आ कर सामने

खड़ी हों जाती

तब उमरिया साथ छोड़ 

आगे और आगे बड़ जाती

रह जाता केवल जीव 

वे इनद़ीया 

जिनके सहारे अगला 

सफर काटना 

ऐक और फिर ऐक और

उमरिया का सफर ।।

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