तारों का उदय कविता

 ऐक तरैया पापी देखें

दो देखें चांडाल

तीन तरैया राजा देखें 

फिर देखें संसार

सांझ के वक्त में रोज 

ऐक तरैया देख 

पापी बनने का सौभाग्य

पल भर को सही कर पाता हूं ।

जल्दी ही नज़र घुमा कर 

दूसरी तीसरी कि तलाश 

शुरू कर देता हूं ।

मन चाहता है कि दो तारें 

ऐक साथ नज़र आए 

तब चांडाल होने से 

बच जाए 

पर चांडाल भी रोज बनना पड़ता 

अपने आप को ही अछूत 

समझना पड़ता ।

फिर विचार आता मन अकुलाता

तीसरी तरैया को देखने 

सारे आसमां में नजर घुमाता 

लेकिन वह तारा नजर नहीं आता 

में चांडाल बना रहता 

न जाने क्यों रास नहीं आता

तभी तीसरी तरैया 

नजर आ जाती 

राजा बनने कि अस्पष्ट रेखा अधर पर छा जाती 

कोई पास होता तब उसे या अपने को 

मेरे राजा बनने कि कहानी बतलाती

कहती तीन तरैया राजा देखें फिर देखें संसार 

तभी कहें सुनने वाला 

जरा ऐक नजर आसमां पर डालो 

फिर इठलाना कि तुम राजा बाकि सब संसार 

ऊपर नजर डाली तब अनगिनत तारें नज़र आए 

राजा मिटा फिर अनन्त के बीच खड़ा कर 

अंहकार हीन सभ्य नागरिक बनातीं 

न पापी हों न चांडाल न राजा 

तुम इंसान हों तारों कि बारात समझाती।।

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