” गरीबा कि दीपावली ” गरीब मजदूर के शोषण कि कहानी

यूं

कोरोनावायरस ने सेठ साहूकारों कि दीवाली फीकी कर दी थी फिर भला दिहाड़ी मजदूरों कि क्या धनतेरस का दिन था कहते हैं इस दिन लक्ष्मी जी का धनाढ्य घर से गरीब घर में पदार्पण होता है या नहीं होता है यह तो आस्था का विषय है या यो कहें कर्म का लेखा जोखा है ऐसा ही गरीब था पेशे से पेंटर बढ़े बढ़े बंगलों में अपने हाथों कि कलां से ठेकेदार के अंडर में काम करता था विभिन्न प्रकार के रंगों को बढ़ी खूबसूरती से बंगलों में उतार देता था वह भी कम समय में ठेकेदार उसकी हुनर का को पहचानता था फिर भी उसे डांट फटकार देता था कि देख यहां पर यह कमी है इस दीवार में धब्बा है आदी आदी कारण यह कि कहीं यह मज़दूरी ज्यादा न मांग लें खैर यह तो हर मजदूर को अपनी हुनर का ठेकेदारों से प्रार्थमिक मिलता था !

गरीबा :- अपने हाथों कि कला से बंग्ले कि दीवार मे रंग भर रहा था तभी ठेकेदार दुःखी राम ने पदार्पण किया बंग्ले में और भी पेंटर काम कर रहे थे दुःखी राम ने चहलकदमी करते हुए पूरे बंग्ले का निरीक्षण

किया था फिर गरीबा के पास पहुंच कर वार्तालाप करने लगा था ।

दुःखी राम :- काम चोरी कि भी हद होती है सारे दिन में जरा सा भी काम नहीं कर सकते ?

गरीबा:- साहब यकिन मानिए हाथ दर्द देने लगें हैं दोपहर में भोजन जल्दी-जल्दी कर के काम पर लौट आया आप नापती करा ले सभी से सो फिट ज्यादा मेरा काम निकलेगा !

दुःखी राम:- क्या कहते हो में अंधा नहीं हूं सब कुछ दिखाईं दे रहा है ।

गरीबा:- क्या बोलना चाह रहे हो सेठ

दुःखी राम :- जरा सा काम भी पूरा नहीं कर सकते दीवार पर हाथ फेरकर फिर बोला देखा सही ढंग से घिसाई भी नहीं कि दीवाली का त्योहार है कहे देता हूं सब कि दीवाली खराब कर दुंगा ।

गरीबा छत कि सीलिंग कि स्टूल पर बैठ कर पुताई कर रहा था तभी आंख में कलर का ऐक छींटा समां गया था दर्द से कराह उठा था बाल्टी बुरश को स्टूल पर लटकाकर आंख मलते हुए बोला था

गरीबा :- राम भला करे भैया ऐसा मत बोलो देखो आंखों में कलर के छीटें बार बार जानें से कम दिखाई देने लगा है पूरी-पूरी ईमानदारी से मजदूरी करता हूं !

दुःखी राम:- सब कुछ पता है फिर जेब में रजनीगंधा का पाउच निकाल कर कुछ दाने मुंह में डालकर चबा चबाकर कर ऐक लम्बी सी कारी फर्श पर बिखेरते हुए कहा मेरा पैसा हराम का है पूरे-पूरे ढाई सौ रूपए देता हूं फिर कुछ लेवर बंगले में नीचे ऊपर सभी कमरों में काम कर रही थी सभी जगह ताक झांक कर के वापस ऊसी कमरे में आ गया था लम्बी आबाज देकर कहा अरे सुखिया कहां मर गया जरा हिसाब लेकर आ सुखिया तीस साल का काइयां इन्सान था मुंह लगा था लेवर कि हाजिरी रजिस्टर में दर्ज करता था अगर कहीं कोई घंटे दो घंटे आराम कर ले तब हिसाब मे से पैसे काट देता था

सुखिया:- जी सेठ काम में लगा था आज धनतेरस है बंग्ले को कंप्लीट कर पार्टी के सुपुर्द करना है !

दुःखी राम :- लगभग लगभग पचास साल की उम्र दिखने में काला नाटा चट्टी नाक का बोला हां भाई हां कितना काम बाकी है ।

सुखिया :- सेठ आठ बजे तक फाइनल हो जाएगा अगर सभी पैटंर मेहनत करे तब ।

दुःखी राम:- ठीक है जरा हिसाब का रजिस्टर तो ले आ मैं कुछ पैसे देकर जाता हूं कंप्लीट होने के बाद आधी आधी पगार बांट देना समझा ?

गरीबा ;- क्या कह रहे हैं सेठ आज धनतेरस है बच्चों को कपड़े राशन दीया बाती तेल लेने जाना है और फिर मकान मालिक का किराया भी देना है !

दुःखी राम:- देख भाई ऐक तो तेरा काम समझ में नहीं आ रहा है दूसरा तुझे मालूम है कि कोरोनावायरस काल मे के समय में रोकड़ा का कितना नुक्सान हुआ है तू तो शुक्र मना कि तुझे काम मिल गया है वर्ना सारे संसार में महामारी में करोड़ों बेरोजगार घूम रहे हैं समाचार पत्र में नित दिन हज़ारों नवयुवक आत्म हत्या कर रहे हैं ।

सुखिया हिसाब का रजिस्टर ले आया था दुःखी राम मोबाइल के कैलकुलेटर से किस मजदूर को कितना पैसा देना है लिख रहा था इस बीच उसने फिर से रजनीगंधा का पाउच निकाल कर कुछ दाने मुंह में डाले थे फिर सिगरेट का पैकेट निकाल कर लम्बे लम्बे कश खींचकर बोला था ।

दुःखी राम:- मैंने सारा हिसाब देख लिया है जैब से पांच सौ रुपए कि गड्डी निकाल कर बोला था सभी का हिसाब कर दौ दौ सौ रूपए मिठाई को दे रहा हूं सो रूपए कि मिठाई का डिब्बा और सौ रूपए में दारू का पांव पानी सलाद आदी ।

गरीबा:- सेठ पूरी पगार चाहिए बच्चों का साथ है बीबी बच्चे राह देख रहै होंगे साल भर का पर्व है !

दुःखी राम :- हां हां भाई कोन मना कर रहा है आठ बजे शाम तक सारा काम फाइनल किजिए फिर आधी पगार लेकर बाजार जाईए सब कुछ खरीद कर दारु पीकर घर जाइए आगे दीवाली के बाद भी तो काम करना ही है बाद में पैसा मिल जाएगा ।

गरीबा ने बहुत मिन्नतें कि बहुत बहुत गिड़गिड़ाता हुआं रूआशा हो गया था पर उस भले आदमी पर कोइ भी असर पड़ता दिखाई नहीं दिया था वह तो सिगरेट के कश खींचकर कार में सवार होकर चल दिया था !

धन के मामले में संसार में दो दुनिया है पहली दुनिया धनाढ्य वर्ग कि है दूसरी दुनिया दिहाड़ी मजदूरों कि जहां धनाढ्य वर्ग दिहाड़ी मजदूरों का जमकर शौषण करते हैं उनकी सोच है कि अगर यह पैसे वाले बन जाएंगे तब हमारे उधोग धंधे व्यापार कैसे चलेंगे दूसरी ओर गरीब वर्ग सब कुछ समझता हुआ भी वेव्स है यहीं सद से समाज कि व्यवस्था चलती आ रही है और शायद सदियों तक चलती रहेंगी ??

गरीबा अनपढ़ था लेकिन था हट्टा कट्टा थोड़ा सा सांवला लम्बा सा कद चेहरा लुभावना ऊसी लुभावने पन से तो बिजली ऊस पर मर मिटी थी बिजली गोरी चिट्ठी करारी आंखें सुतवा नाक लम्बी ग्रीवा छरछरा बदन खूबसूरत सरकारी बिल्डिंग बन रही थी ऊसी के सामने बिजली का घर था आंखें कब लड़ गई उन्हें पता ही नहीं चला छुप छुप कर मिलने लगे थे दैहिक प्यास नजदीक ले आई थी लाख सावधानी बरतने पर भी ऐक दिन रंगेहाथ पकड़ा गये थे फिर क्या गरीबा की जबरदस्त पिटाई हुई थी गरीब गरीबा मज़दूरी छोड़कर अपने गांव भाग गया था पर बिजली कहां मानने वाली थी उसके दोस्तों से मोबाइल नम्बर लेकर सहेलियों के फोन पर बात करती थी गरीबा ने लाख समझाया कि मैं तुम्हें कोई भी सुख नहीं दे पाऊंगा मजदूर हूं सारे दिन मेहनत कर के मेरे शरीर से पसीने कि गंध आएगी कभी कभी

रोटी भी नसीब नहीं हो पाऐगी पर बिजली कहां मानने वाली थी रूठ कर कहां था मैं पढ़ी लिखी हूं आगे बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर आगे पडूंगी ओर बड़ी अफसर बनूंगी !

सपने तो सपने होते हैं भले ही सोते हुए देखो या जागती आंखों से कभी भी सच नहीं होते सपने सच होते हैं परस्थितियों और कठिन परिश्रम से दोनों ने घर से भागकर चूंकि कानूनन बालिग थे अदालत ने शादी का प्रमाण पत्र दे दिया अब कठिन राह थी कठिन परिश्रम था जहां पर भी यह जोड़ा काम मांगने जाता था ऊस मालिक कि नजर बिजली कि देह को आर पार भेदती हुई रहती किसी ने तो अपना

निवेदन भी बिजली के समझ रख दिया था पर बिजली थी मन कि पक्की गरीबा के अलावा किसी को भी अपना मन का मीत नहीं बनाना चाहती थी या यों कहें सचरित्र दोनों ही शहर से सहर काम धाम कि तलाश में भटकने लगे थे आखिर में उन्होंने दिल्ली कि झोपण पट्टी में अपना आशियाना बनाया था इस बीच बिजली के कोख में नया अंकुर किलकारियां मानने लगा था ऐक बेटी ने जन्म लिया था बिजली पढ़ाई-लिखाई सब कुछ भूल कर पति और बेटी कि परवरिश में सिमट कर रह गई थी !

आठ बजे तक बंगले का काम सुखिया कि नजर से पूरा हुआ था फिर उसने एक ऐक कर के सभी मजदूरों कि पगार का आधा हिसाब-किताब किया था गरीबा को ऐक महीने काम करते हुवे हुआ था इस बीच कुछ एडवांस भी ले चुका था उसे दो हजार रुपए दिए गए थे उसने मन ही मन हिसाब लगाया था बिजली के कपड़े पांच सो रूपए में बच्ची के कपड़े तीन सो रूपए में राशन हजार रुपए का दीया तेल बाती सौ रूपए में यह हुए थे उन्नीस सो रूपए बच रहा था ठेकेदार कि बख्शीस सहीत तीन सौ रूपए जुग्गी का किराया देना था हजार रुपए पर जुग्गी वाला भला आदमी था तो बाद में भी दे देगे चलेगा सब सामान खरीदने के बाद दुःखी राम देशी शराब कि दुकान पर पहुंच गया था दो पांव लेकर जमकर पी फिर वह घर पहुंचा था !

बिजली ;- बढ़ी देर कर दी कब से बाट जोह रही हूं !

गरीबा :- काम ही आठ बजे तक चला था फिर जेब से बीड़ी का पैकेट दिया सलाई निकाल कर बीड़ी जलाईं थी ।

बिजली :- पता तो होगा आज धनतेरस है !

गरीबा:- झूमकर हां बीड़ी का कस खींचकर बोला था !

बिजली;- इस दिन मां लछमी अपनी कृपा दृष्टि से माला माल कर देती है !

गरीबा;- सब बकवास है ईमानदार मेहनत कस लोगों पर कभी भी लछमी जी अपनी कृपा नहीं देगी अनपढ़ हूं पर पता है कि सभी मजहबों के धार्मिक स्थलों पर बैईमान धनाढ्य लाखों रूपए दान कर करोड़ों कमाते हैं वह भी दिहाड़ी मजदूरों का पेट काटकर !

बिजली;- बाते भी कर रही थी साथ ही दिया मे बाती तेल डालकर दीपोत्सव का दिखावा हेतु तैयारी कर रही थी चलो हाथ मुंह धोकर तैयार हो ओर पूजा कर के भोजन करो हमें!

पर गरीबा पर तो नशा सवार था बच्ची को गोद मे उठा कर बोला था मेरी दीवाली मेरी धनतेरस तो तू है मेरी रानी जो मुझे हमेशा दुःख सुख मे साथ देती है फिर बड़बड़ाने लगा था तेरा साथ है कितना प्यारा हर दिन लगता न्यारा न्यारा कोइ दिन है धन तेरस कोइ कोइ है जगमग जगमग तारा तेरा साथ है कितना प्यारा यह कहता है गरीब बेचारा जो फिरता है मारा मारा ।।

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1 thought on “” गरीबा कि दीपावली ” गरीब मजदूर के शोषण कि कहानी”

  1. यह युग धन का है धन वान व्यक्ति ही सभी त्योहार सुख शांति से मना रहे हैं दुसरी तरफ गरीब आदमी के श्रम का शौषण हों रहा है उसे न टाइम से मजदूरी मिल रहीं हैं न ही उस कि काबिलियत के अनुसार पैसा इसी विषय पर आधारित है यह कहानी।

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