“काल गर्ल “बेव सिरीज़ स्टोरी भाग -4 करूणा कि व्यथा कथा

पिछले भाग से आगे….

करूणा का जीवन यूं ही लक्ष्य हीन आगे बढ़ रहा था वह सारे दिन नशें में डूबी रहती व अपने भाग्य को कोसती रहतीं थीं कभी कभी घर कि याद आती तब अम्मा अम्मा कह कर रोने लगती थी कभी कभी भाई बहिन को अपने आसपास महसूस करती जो उससे कहते दीदी दीदी आप क्या थी आप तो पड़ने में अव्वल थी आप तो आइ ए एस डाक्टर बनना चाहतीं थी और अब क्या बन गई छी छी आप तो नशा करने लगीं आप मेरी दीदी नहीं हो सकती नहीं हों सकतीं कभी कभी पिता जी को अपने नजदीक पाती जो उसके सिर पर हाथ फेरकर कहते बिटिया गलती मेरी है मैंने ही तुझे मोबाइल फोन दिलाया था उसी फोन से तेरा सत्यानाश हुआ तेरी तो कच्ची उम्र थी भावना में वह ने वालीं फिर इस उम्र में पर लिंग का आकर्षण होना स्वाभाविक था इस उम्र में अच्छे बुरा सोचने कि समझ कम ही रहती थी अगर मैंने तेरे फोन पर निगरानी रखीं होती तब तेरी गलती पर तुझे समझाता फिर पगली अगर तूने गलती कि थी तब ऐक बार तो मुझे या अपनी मां को बताती हम कुछ न कुछ रास्ता निकाल कर ….. फिर पिता जी रोने लगे थें कभी कभी उसका प़ेमी राजकुमार उसकी घायल देह पर मरहम लगा कर उससे कहता करूणा मैंने तेरे साथ बहुत अन्याय किया मुझे भगाकर नहीं लाना चाहिए था पर मैं क्या करता तुम्हें तो में आत्मा कि गहराई से चाहता था तेरी मुहब्बत में गिरफ्तार था तेरी एक मुस्कुराहट पर लट्टू था फिर भला मुझे क्या पता था कि एक्सीडेंट में भगवान मुझे अपने पास हमेशा हमेशा के लिए बुला लेंगे खैर मेरी रानी देखो तुम्हारी देह पर मैंने मरहम लगा दी है आराम तो लगा होगा कमीनें मेरी करूणा कि देह को कैसे कैसे नोचने लगते हैं वह बुड्ढा नेता तो कितना जुल्म ढा रहा था मन तो करता था कि साले का गला घोट कर अपने पास बुला लूं परन्तु काश में ऐसा कर पाता में तों सिर्फ तुम्हारे साथ घटिया कामुक पुरुष के अत्याचार को देख सकता हूं कोई मदद नहीं कर सकता पर तुझे सलाह दें सकता हूं कोई अच्छे आदमी के साथ व्याह कर एक कि बन कर रह फिर ऐसा कहते ही राजकुमार उढकर बादलों में समां गया था ।

फ्लेट उसके नाम पर था कार भी वह चलाना सीख गई थी कभी कभी समुद्र के तट पर पहुंच जाती समुद्र को देखकर कहती आपके तट के नजदीक खड़ी हुई हूं आप एक बार अपनी सीमा लांघ कर मुझे अपने अन्दर खींच लें देखो मुझे अपने आप से नफ़रत होने लगी है मुझे इस खूबसूरत देह से घिन आ रही है मैं आपसे निवेदन करतीं हूं मेरे उपर दयाभाव दिखा कर अपने आगोश में समेट लें वह वदवाहस सी समुद्र के अंदर जा रही थी वह घुटनों से ऊपर समां गयी थी शायद और सम्मान चाहतीं थी तभी पीछे से किसी मजबूत हाथों ने उसे खींच लिया था किनारे पर आकर उसने देखा वह खींचने वाला बीस पच्चीस साल का नवयुवक था जिसकी दाड़ी बड़ी हुई थी देह पर साधारण से कपड़े थें लम्बा कद गोरा चेहरा जो लुभावना था जो कि किसी दार्शनिक जैसा था या फिर कोई कलाकार उसने कहा था क्या मेम डूबने जा रही थी अगर सही समय पर में आपको नहीं पकड़ता तब आप को लहरें अन्दर खींच लेती ऐसा लगता है कि आप जीवन से परेशान होकर आत्मघाती कदम उठा रही थी देखिए भगवान् ने हमें मनुष्य देह दी है जो कि संसार में चल अचल प्राणी यो में सबसे अच्छी देह हैं हमें भगवान कि बनाईं हुई रचना को अपनी मनमर्जी से नष्ट करने का कोई अधिकार नहीं नवयुवक कहता रहा था करूणा उसे देखती रही थी फिर झटके से दोढकर कार कि और चलीं गईं थीं कुछ देर बाद मुंबई कि सड़क पर कार फर्राटा भर कर सरपट भाग रही थी पर उसके मस्तिष्क में उस युवक का समझाना बार बार आ रहा था आंखों के सामने उसका असत व्यस्त परिधान बडी हुईं दाड़ी बड़े हुए बाल दिखाई दे रहे थे जो कि लुभावने थे सहसा उसे याद आया था कि उसने तों उसे इस उपकार के लिए धन्यवाद भी नहीं दिया था तभी तो कार उसने वापस मोड़ ली थी फिर उसी जगह दूर दूर तक उसकी आंखें उसे खोजने लगीं थी परन्तु वह तो कहीं दिखाई नहीं दे रहा था शायद वह चला गया था उससे रहा नहीं गया था तभी तो आसपास भेल नारियल पानी कि दुकान पर उसका हुलिया बता कर उसके पता पूछ रहीं थीं एक दुकान वाले ने हां वह तो एक चित्रकार हैं नाम पता तो मालूम नहीं परन्तु कभी कभी स्टैंड बोर्ड लगाकर रंगों को भरकर किसी अप्सरा कि पेंटिंग बनाता रहता है हां उस पेंटिंग का चेहरा हु बहू आप से मिलता जुलता है ऐसा किजिए आप अपना मोबाइल फोन नम्बर मुझे बता दिजिएगा जब वह आएगा में उससे आपकी बात करा दूंगा परन्तु उसने नम्बर नहीं दिया था वह वापस कार में सवार होकर फ्लेट में आ गयी थी ।

अगला भाग जल्दी ही लिखना जारी …

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