कारपोरेट कल्चर का प्यार कहानी जहां दिल से प्यार नहीं करते दिमाग से करते हैं क्योंकि दौलत ही सर्वोपरि है

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 अंधेरी भादों मास कि ट्रेन घुप्प अंधेरे को चीरती हुई आगे बढ़ रही थी कभी कभी तेज बिजली चमकने से खिड़की से रोशनी अंदर पहुंच रही थी बाहर तेज वारिस हो रही थी ऐसे ही मौसम में में अहमदाबाद से इंदौर आ रहा था मेरी बर्थ नीचे थी सोचा कि सोने से पहले कुछ पेट पूजा कर लूं क्यों कि सुगर वाले मरीज को भूख ज्यादा ही लगती है इसलिए मैंने रेलवे स्टेशन से ही फल नमकीन बिस्कुट पहले ही खरीद कर रख लिए थे चूंकि मेरी बर्थ नीचे थी सामने वाली बर्थ पर एक नौजवान आदमी उदास बैठा हुआ था चेहरे मोहरे से वह बहुत ही सभ्य अच्छे खानदान का लग रहा था मैंने उसके उपर एक सरसरी नजर डाली थी उसका चेहरा भले ही मुरझाए हुए था पर चेहरे पर मासूमियत भरी हुई थी  किसी छोटे बच्चे कि तरह  फिर मैंने उस कि कद काठी के मुआवना किया था भरी हुई देह थी बाहें कसी हुई थी सीना चौड़ा था चेहरा भी खूबसूरत था चेहरे पर काली स्याही मूंछें उसके व्यक्तित्व पर चार चांद लगा रहीं थीं कुल मिलाकर कर उसका व्यक्तित्व मर्दानगी से भरा हुआ था वह मोबाइल पर कुछ पड़ रहा था मुझसे रहा नहीं गया था मैंने उसे टोक कर कहा था भाई कहां जाना है ।

जी इन्दौर उसने जवाब दिया था ।

मुझे भी इन्दौर जाना है मैंने आगे बातचीत बढ़ाने के लहजे से कहा था फिर मैंने उससे कहा था कुछ फल नमकीन बिस्कुट लें लीजिएगा उसने बड़ी ही विनम्रतापूर्वक मना कर दिया था हालांकि में जानता था कि वह भूखा था और झूठ बोल रहा था कहीं न कहीं उसके अंदर उथल फुतिल चल रही थी ।

मैंने फिर से कहा था भाई साहब रेलवे यात्रियों को कभी भी सह यात्रीगण का भोजन फल नहीं खाना चाहिए क्योंकि बहुत सारे केश समाचारपत्र, इंटरनेट पर पढ़ने को मिलते हैं कि भोजन में कोई नशा मिलाकर खिला दिया फिर उसका कीमती सामान लेकर रफूचक्कर हो गया पर आप यकिन मानिए मैं ऐसा नहीं करूंगा मेरे ऐसा कहने पर ही वह बोला था ।

मेरे पास यह मोबाइल फोन व सवा तीन सौ रूपए ही है व देह पर पहने हुए कपड़े भला कोई क्या ले जाएगा उसने बहुत ही मासुमियत से जवाब दिया था ।

खैर थोड़ी सी बातचीत में ही उसे मेरा विश्वास हो गया था वह मेरी बर्थ पर बैठ गया था उसने कुछ हल्का फुल्का नाश्ता किया था फिर वह मोबाइल फोन पर कुछ पड़ने लगा था मैंने मन ही मन में विचार किया था शायद वह कोई खबर समाचार पत्र पढ़ रहा है क्योंकि टेक्नोलॉजी के इस युग में हर बड़े अखबार का अपना खुद का ही एप्स है जो कि कभी भी कहीं भी मोबाइल फोन पर इंटरनेट के माध्यम से हमें खबरें दिखाता है व पढ़ाता भी है हालांकि मेरा अंदाजा गलत निकला था वह हिंदी साहित्य का ब्लॉग पढ़ रहा था मैंने उससे कहा था भाई साहब में भी ब्लाग लिखता हूं । 

तब मैं अपनी जीवन कि हारी हुई बाजी आपको बता रहा हूं यह कहानी मेरे जज़्बात मेरे दिल मेरी देह से खिलवाड़ का हैं आप मेरा छद्म नाम रखकर संसार के सामने रखियेगा में स्त्री कि पूजा अर्चना करता हूं सारे संसार में स्त्री विमर्श पर बहुत ही लिखा जाता है बड़े बड़े सेमिनार आयोजित किए जाते है बुद्धी मान समाजवादी लोग अपनी अपनी राय देते हैं व फिर संसार कि सभी देशों कि सरकारें उनके हित के लिए कानून बनाती है मेरी नज़र से यह ठीक है उन्हें अधिकार मिलना चाहिए परन्तु कहीं कहीं कहीं वह अपने अधिकारों का हनन करतीं हैं उसने दर्द भरें लहज़े से कहां था ।

रेलगाड़ी सरपट दौड़ रही थी बाहर तेज मूसलाधार बारिश हो रही थी खिड़की के बाहर घुप्प अंधेरा में कुछ भी दिखाई ंंनहीं दें रहा था पर कभी कभी किसी गांव कि जलतीं हुए लटटु दिखाई दे जाते थे  मैं समझ गया था कि बंदा दिल कि चोट खाए हुए था उसे जल्दी कुरेदना उचित नहीं समझा था पानी कि बोतल लेकर उसे दी थी कुछ घूंट हलक में उतार कर उसने कहा था भाई साहब आप को मेरा पझ ज़माने के सामने रखना होगा में आपको सिलसिले तरीके से सारा किस्सा ब्यान करता हूं ।

उसके अनुसार उसका नाम सुनिल कुमार था वह पैसे से मल्टी नेशनल कंपनी में चार्टर्ड अकाउंटेंट था काले धन को कैसे सफेद रंग दिया जाएं उसे बखूबी जानता था चूंकि उसके अनुसार कंपनी कि मालकिन महिला थी जिनकी उम्र उससे कुछ साल ज्यादा थीं वह मार्डन जवाने कि महिला थी जो उससे बहुत प्यार करती थी  उन्होंने उस का हर प्रकार से ख्याल रखा हुआ था उसके रहने के लिए पाश कालोनी में फ्लेट आने जाने के लिए कार मोटी तनख्वाह आदि उनके बीच पति पत्नी जैसे संबंध कभी दिन में फिर सारी सारी रात हजारों बार बन गए थे इतना कहकर वह फिर से खामोश हो गया था उसके उदास चेहरे पर आंख से कुछ बूंदें गाल पर लुढ़क गई थी मुझसे रहा नहीं गया था मैंने अपना रूमाल उसे देकर कहा था रोते नहीं सुनिल मर्द को रोना सोभा नहीं देता सम्हाल कर रखिए अपने आप को उसने रुमाल से आंसू पोंछ कर दो तीन घूंट पानी हलक में उतार लिया था ।

थोड़ी देर बाद मैंने फिर उसे कुरेदना उचित समझा था भाई आगे क्या हुआ था मतलब आप कहते हैं कि आप कि व्यथा ज़माने के सामने आना चाहिए  ।

उसके अनुसार  सब कुछ अच्छा चल रहा था में भी उसे अपनी दिल कि गहराई से चाहता था क्योंकि वह बहुत ही सुन्दर और समझदार थीं मेरे मन को पढ़ लेती थी मेरे विचार मिलते थे हम शादी करने का प्लान बना रहे थे  पर हमारे और उसके बीच गरीब अमीर परिवार कि दीवार थी हमारे जैसे उसकी कंपनी में हजारों आदमी काम कर रहे थे मैंने उससे कहा था देखिए हम आपके सामने आप के नौकर ही है जो कि सिर्फ अपनी ड्यूटी निभा रहा दिन में आपका एकाउंट का काम फिर रात्रि में आपकी काम वासना से दहकती देह को शांत करता है हमारे आपके बीच व्याह संभव नहीं है तब वह मुझे चूमते हुए कहती थी तुम मेरे सरताज अजीज हों में तुम्हारे साथ ही सारा जीवन व्यतीत करूंगी हालांकि हमारे बीच यह सही है कि में कारपोरेट घराना से ताल्लुक रखती हूं फिर मैंने भी अपनी हीरे कि फेक्ट्री को खड़ा करने में जी तोड़ मेहनत कि हैं आज हमारी फैक्टी से तराशा हुआ हीरा मार्केट में तहलका मचा रहा है फिर हमारे प्रोडेक्ट कि विश्व के सभी देशों में मांग है ।

सुनिल ने आगे का बकाया बताया था यकिन मानिए उसके ऐसा कहने पर मैं अपने आप को संसार का सबसे खुशनसीब प्रेमी समझने लगा था  पर ?

पर क्या सुनिल  वह फिर खामोश हो गया था उसके गाल पर फिर से कुछ अश्रु धारा वह निकलीं थी  थोड़ी देर बाद उसने अपने मन को शांत किया था फिर उसने कहा एक दिन वह फ्लेट पर आकर  बहुत ही खुश थी आते ही गले से लग गयी थी  सीने से चिपक गई थी चुंबन कि बौछार कर रही थी मुझे लगा था कि हम दांपत्य जीवन में मतलब शादी करने वाले हैं में भी खुशी से चहक उठा था फिर हम दोनों एक दूसरे को चूमते हुए अपने प्यार का इज़हार कर रहे थे परन्तु उसने कहा था पता हैं सुनील मेरी शादी तय हो गई है जिस परिवार में हुई है उनका बहुत बड़ा कारोबार हैं कारपोरेट घराना हैं उस परिवार के पास एक लाख करोड़ रुपए कि जयजाद हैं बहुत सारी फेक्ट्री रियल एस्टेट का कारोबार आदि 

सुनिल अब हस पड़ा था ठहाके लगा रहा था उसके इस कृत्य पर में भौंचक्का रह गया था सेकंड क्लास का डब्बा था उसके एसे हंसने पर कुछ मुसाफिर जाग गये थें कुछ  लोगों ने हमसे पूछा था क्या यह आपका दोस्त पागल हैं तब मैंने कहा था नहीं हम दोनों  अपनी ही बात पर हंस रहे हैं आप लोगों कि नींद में जो बाधा उत्पन्न हुई में माफी मांगता हूं ।

सुनील ने कहा था मेरी प्रेमिका मेरी मालकिन के अपने व्याह पर में भौंचक्का रह गया था मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसकने लगी थी ऐसा धोखा ऐसा विश्वास घात ऐसा भावना से खिलवाड़ फिर मेरी देह से खिलवाड़ ऐसा छलावा उसने अपनी मालकिन प्रेमिका से कहा था बताइए आपने ऐसा मेरे साथ क्यों किया क्यों क्यों क्यों ??? तब वह बोली थी देखो सुनिल यह कारपोरेट घराना हैं यहां के रिश्ते नाते सब कुछ धन दौलत पर ही टिकें हुए हैं हमारे पास भावना का कोई भी मूल्य नहीं है सच कहती हूं में जिससे शादी कर रहीं हूं उसके जीवन में मेरी जैसी अनेक लड़की आई होगी जिसकी देह से खिलवाड़ कर एक दूसरे को इस्तेमाल कर के फिर शादी कर अपने पति के साथ रहतीं होंगी पर वह मन से ंनहीं रहती है सिर्फ उनका तन ही कभी कभी पति महोदय के लिए काम का रहता है समझें कारण वह रात दिन अपनी सेक्रेटरी के साथ विदेश यात्रा बिजनेस डील पर ही ध्यान देते हैं और फिर वह अपनी देह कि जरूरत सेकेट्री या फिर कही भी बाजारू औरतें से पूरी कर लेते हैं अब तुम ही कहो सुनील हम लोग मतलब हमारी जैसी पत्नी क्या करेंगी इसलिए हमने भी अपना रास्ता तलाश लिया था तुम्हें मेरे साथ सारे जीवन रहना होगा फिर में तुम्हें तन मन धन से चाहतीं हूं मेरा पति तो सिर्फ मेरे नाम का ही रहेगा उसे रहने दो मैं बच्चे तों तुम्हारे जन्म दूंगी समझें? 

सुनील ने प्रतिरोध किया था समाज के सामने दुल्हन बनाना चाहता था इस विषय पर दोनों के ही बीच बहस हुई थी अंत में सुनिल कुमार को फ्लेट से निकाल दिया गया था उसकी नौकरी चली गई थी कार छीन ली गई थी इन शब्दों के साथ पैर का जूता पैरों में ही अच्छा लगता है तुम लोग कभी भी नहीं बदल सकते हों तुम्हारी सोच घटिया थी और रहेंगी यह प्यार व्यार सब कुछ कहने कि ही बातें हैं यह कविता कहानी फिल्म में अच्छा लगता है पर वास्तविक समय में धन ही सर्व प्रथम है धन ही प्यार हैं यह सब बकाया बताकर वह फूटफूट कर रोने लगा था और में चुपचाप उसे रोता हुआ देखता रहा था क्योंकि मेरे पास उसके टुकड़े टुकड़े दिल के इलाज के लिए कोई भी शब्द नहीं थें 

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1 thought on “कारपोरेट कल्चर का प्यार कहानी जहां दिल से प्यार नहीं करते दिमाग से करते हैं क्योंकि दौलत ही सर्वोपरि है”

  1. कारपोरेट कल्चर पर आधारित है यह कहानी जहां पर दिल भावना कि कोई भी जगह नहीं है वहां पर तो हर रिश्ता स्वार्थ पर पैसे से ही टिका हुआ है ।

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