” काला गुलाबअध्यात्म से जोड़ता काव्य संग्रह

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 ओ गुलाब तुम रह गये 

कि में तुम्हें छोड़ आया 
यहां बहुत खोजा तुम्हें 
पर तुम नहीं मिले तो बहुत पछताया ।
मैंने सोचा चलो तुम्हारे 
अन्य साथियों से मिल कर बात करूं 
फूल तुम किसी दूसरे फूल से 
तुम्हारी शिकायत करूं 
पर यहां न गैंदा न चमेली 
न जुटी कोइ भी नजर 
नहीं आएं 
तब तुम्हारे अभाव में 
हम थे घबड़ाया
हम चारों तरफ भटक आएं 
सरोवर तक गये 
पर सरोज भी न नजर आएं 
जंगल भी भटके पर 
तुम्हारे जैसा कोई नजर नहीं आया 
तब मेरी पसंद सुन 
मेरा दोस्त भी मुस्कुराता हुआ 
बोला कि गुलाब 
को तुम इस इलाके में 
खिलाओगे 
वे शर्म के प्रेमियों को 
क्या जीते जी जलाओगे 
मेने कहा था वह भी कोई फूल हैं 
दोस्त बोला तुम नहीं मानो 
पर इस इलाके के लिए 
वही अनुकूल है ।
मेने कहा क्यों 
जरा स्पष्ट बताओगे 
दोस्त बोला बगैर गमला 
बगैर पानी दिए बगैर रखाए 
बेसरम चाहे जहां उगाओ 
पर मैंने कहां 
पर बेसरम का फूल पूजा में शामिल 
नहीं होता 
दोस्त बोला न जाएं 
यहां बसे लोगों को इसके 
अलावा कुछ नहीं माना हैं 
यहां देवता दूब पा 
अपने भाग्य पर इठलाता हैं 
मैंने कहा यह भी कोई बात हुई 
गुलाब के सामने बेसरम की 
क्या बिसात है ।
दोस्त छड़ भर मौन रह 
मुस्काते हुए बोलें 
अभी तुम नये नये आएं 
इसी से बेसरम के खिलाफ बोल गए 
अन्यथा इसके समर्थक को 
देख कर अच्छे अच्छों के ईमान डोल गये 
इसलिए गुलाब कि चर्चा भले कर लेना 
पर कलम बेसरम कि अपने दरवाजे 
पर लगा लेना 
मेने कहा मे तो गुलाब 
लगाउंगा 
बोलें दोस्त तुम्हारी मर्ज़ी 
मे तो बेसरम लगाने कि 
सलाह औलाद को भी दे जाउंगा 
और अंत में बोला दोस्त 
धीरे से 
तुम्हारा गुलाब खिले 
तब मुझे तो बताना 
बेसरम से अच्छा फूल 
उसको कैसे होगा मेरे दिल 
को समझाना ।
तुम महकते गुलाब 
मे तपता 
भावनाओं से भरा सैलाब ।
पर मिलन को एक होने को 
हम सदियों से मौन बनें 
हो रहें बेताब ।
दूनिया देख रहीं 
हमारा तुम्हारा मर्यादा से 
बंधा सबाब ।
ओ मेरे आत्मिय गुलाब 
आज नहीं कल 
पंडितों के मुंह से तुम्हारा 
नया नाम सुना पाटिल 
एसे प़तित हुआ , जैसे 
मेरी व्यथा का हुआ हों 
उदघाटन 
वे तुम्हारे साथ आम और 
कटहल को याद कर 
तुम पर हस रहें थें 
यह कह कर कि गुलाब कहता है 
कुछ करता नहीं 
और कटहल कहता नहीं 
सिर्फ करता है और आम 
कहता भी हैं 
और करता भी है 
बे कहने को सिर्फ फूल कह लेते 
करने को सिर्फ फल समझ लेते 
प्रतीत यह हुआ कि बे 
अंधेरे में यहीं कहीं 
भटक लेते 
प्रसन्नता न जाने कैसे 
फल को ले फिरा करते ।
ओ मेरे आत्मिय गुलाब 
तुम्हें बताऊं कि न बताएं 
समझ में नहीं आता 
पर बिना बताए रहा नहीं जाता 
क्यों कि तुम्हारे अलावा अपना 
दूर दूर तक कोई 
नजर नहीं आता 
यहां जो अपना बन 
प्यारा बना हमारी हंसी उड़ाता 
तुम तो अकेले 
जो हमसे भेदभाव नहीं करते 
इसी से हृदय कि सुन लेते 
तुम अजीब हों 
फल के बिना रह लेते 
और यहां फल के लिए 
सब पागल बनें फिर रहे होते ।
ओ मेरे आत्मिय गुलाब
तुम्हारे पास फल नहीं हैं 
न रहे 
पर तुम्हारी सुचिता  सुन्दरता 
इक दम अनोखी हैं 
तुम जैसी मुस्कान हमने कहीं 
नही देखी है 
फल तो हजारों के पास हैं 
करोड़ों फल के लिए पागल बने भाग रहें 
पर तुम रात दिन हम 
 अभागे  को 
संता वना देने को 
चाहे जिसके आंगन में जाग रहै ।
 
ओ मेरे आत्मिय गुलाब 
तू सुगंध शीतलता दे 
मन को हरषाता है 
तू ओषधी वन कभी कभी 
वायु विकार को मिटाता है 
जब तू सफल बैध कि तरह 
कुछ कहता मुस्कुराता 
नजर आता है ।
ओ मेरे आत्मिय गुलाब
में जब तुम्हारे पास खड़ा हो जाता 
मन ही मन सकुचाता 
मन ही मन खिलखिलाता 
अपनी धड़कन में 
नये नये स्वर को पाता 
तब मन तुझे वाहों के 
घेरे में घेरने को मचल जाता 
यह शरीर फूलों का चहेता 
बस तेरे कांटों कि ख्याल कर 
बस तुझे देखता ही रह जाता ।
ओ मेरे आत्मिय गुलाब
तुम गमलों से आगे 
खेतों कि और भाग रहें 
लाखों किसानों कि किस्मत बने 
खेतों में जाग रहें 
जब तू खेतों में खिलखिलाता हैं 
तब देखने वाला 
खाना पीना भूल जाता है ।
जब खेतों से टूट कर 
तू व्यापारी के घर जाता है 
तब खेत बेचारा तेरे अभाव में 
व्याकुल सा पछाड़ खाता 
नजर आता है ।
तेरे प़ेमी जब 
तुझे ही देखने खेत पर जाता है 
तब प्रेमी तेरे जन्म दाता को 
देख देख हंसता नजर आता है ।
ओ मेरे आत्मिय गुलाब
तुम हमारे हम तुम्हारे हैं 
यह बात दो दिलों के 
दुवारे है इसी पर मुस्करा
 मुस्कुरा कर चल देते 
कभी कभी दो पल को ठहर लेते 
जल्दी हुई तब कभी तुम हमें 
हम तुम्हें साथ ले चल देते 
कुमहलाने को मिट जानें को 
कह देते और मिटते ही 
कभी तुम हमें 
कभी हम तुम्हें 
बे जान मिट्टी सा समझ 
रास्त
 में फेक चल देते ।
ओ मेरे आत्मिय गुलाब 
तू जब जब कली बना 
इस जग में आया 
तब तितली ने तेरे 
आने का संदेश 
मधुमक्खी को बताया 
दोनों ने आ तेरे आंगन में 
नाच नाच नव उत्सव मनाया 
तभी भंवरे ने आ नया तराना सुनाया 
यह देख सुन तू एक दम मुस्कुराता नजर आया 
मधु दान दे दे कर 
सभी को खुश कर 
आगे खिली कली के पास 
जाने का रास्ता बताया ।
ओ मेरे आत्मिय गुलाब 
आज मेरे नैना ने 
फिर तुम्हारे पौधों कि ओर झांका ।
चारों को अलग अलग 
हालात में देख 
जाने किसने आंका 
कि छोटी कली से 
प्रस्फुटन हो 
हम तुम को संदेह से 
था देख रहा 
तुम्हारी कली वना 
लोभी भंवरे के साथ 
था खेल रहा 
तीसरा तू था 
लाखों में एक 
मुस्कुरा मुस्कुरा न जाने किसकी 
राह देख रहा ।
चौथा माली कि टोकरी में 
मे पड़ा
हम तुम को 
अपने भाग्य को 
हंस हंस कर देख रहा 
पर तीसरे को चौथा देख 
अपनी अतीत समझ 
सुख पाता है 
पहले दूसरे 
ओ तीसरे तुझमें 
अपना भविष्य समझ 
लांघ सीमा यह इशारा 
करता इठलाता 
तू रोज़ नजर आता है
 ओ मेरे आत्मिय गुलाब 
तुम तो 
चाहे जहां पहुंच जाते हों 
सभा समाज में 
तुम इंत्र वना खुशबू फैलाते हों 
कभी गुलाब जल वन 
तुम ठंडक पहुंचानते हो 
कभी गुलकंद वन 
मुंह मीठा कराते हों 
जाने किस किस रूप में 
मानव मन को लुभाते हो 
बड़े भाग्यशाली हो तुम 
चाहे जिसका प्यार सहज ही 
पा जाते हों ।
 लिखना जारी रहेगा….
 
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1 thought on “” काला गुलाबअध्यात्म से जोड़ता काव्य संग्रह”

  1. गुलाब का फूल देवताओं को नेता अभिनेता अर्थी के साथ दवा में सब जगह इस्तेमाल होता है चूंकि वह अच्छा बुरा सब कुछ देखकर मुस्कुराते हुए मुरझा जाता है फिर भी किसी से उसको कोई शिकवा नहीं रहता सच्चे अर्थों में वह हमें जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करता है व परमेश्वर के पास जाने का मार्ग प्रशस्त करता है

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