कलमकार कि आत्म कथा

पिछले भाग से आगे

बारहवीं का रिजल्ट घोषित5″ गया था कलमकार के साथ के लड़के अच्छी डीबिजन से पास हुए थे वहीं वह सैकंड ग्रेड से पास हुआ था उसके रिजल्ट के परिणाम से पूरा परिवार परेशान था दादा ताने पर ताने दे रहे थे फिर उन्होंने मन ही मन विचार किया था लड़का रोज़ साइकिल से पच्चीस किलोमीटर दूर आता जाता है थक जाता होगा क्यों न शहर में ही मकान किराए पर दिला दूं आने जाने का समय का सदुपयोग पड़ने में हों जाएगा फिर क्या था जल्दी ही कमरा किराए से ले लिया गया था उसके अन्दर स्टोव वर्तन बिस्तर खटिया राशन पानी जमा कर दिया गया था अब कलमकार को अकेला छोड़ दिया गया था वह अपने हाथ से खाना पकाता कपड़े धोता था फिर पढ़ाई करता था हां अब वह लाइब्रेरी का सदस्य बन गया था जहां पर विश्व साहित्य कि अनेकों पुस्तकें जमा थीं उन्हें पड़ता विचार कर्ता चिंतन करता उसकि दिनचर्या बदल गयी थी उसका व्यवहार बदल गया था कालेज में सहपाठी के बीच सबसे होनहार कहलाने लगा था वह कालेज में हर प्रकार के कंपटीशन में भाग लेता था जैसे कि लेख , वाद-विवाद प्रतियोगिता , खेलकूद आदि यूं फुटबॉल का अच्छा खिलाड़ी बन गया था उसका सिलेक्शन प्रदेश लेबल पर हो गया था साथ में पड़ने वाली छात्राओं के बीच खासा लोकप्रिय था कुछ तों उससे दोस्ती कर नजदिकियां बढ़ाने के लिए तैयार थीं पर अब वह सिर्फ अपने कैरियर पर ध्यान दे रहा था ।

गोरे लाल ने शहर में प्लांट खरीद लिया था मकान का निर्माण कार्य शुरू हो गया था कभी कभी गोरे लाल से मुलाकात हो जाया करती थी पर उसके मन में जो पम्मी यानी उसकी पत्नी के प्रति गंदे ख्याल पनप रहे थे वह सब निकल गया था ।

भादों मास का महीना था उस दिन मेघ गर्जन करते हुए धुआं धार वर्ष रहें थे ऐसे ही मौसम में गोरे लाल पत्नी के साथ कमरे पर आ गए थे

कलमकार:- अरे काका आप काकी के साथ ??

आप दोनों तों भींगे हुए हों आइए आइए !

गोरेलाल :- भैया तुम्हें तो मालूम ही है कि मकान का निर्माण जारी है छत डल गई है प्लास्टर अंदर का हो गया है अब पेंट और टाइल्स का काम बाकि है तुम्हारी काकी के पसंद का ही पेंट टाइल्स लगवाना चाहता हूं इसलिए साथ ले आया अब मौसम का हाल तों देख ही रहे हों घर जाना नामुमकिन सा लगता है फिर कल खरीददारी भी करनी है दो दिन तुम्हारे पास ही रुकूंगा।

कलमकार:- कैसी-कैसी बातें कर रहे हों काका आप का ही घर हैं फिर पिताजी ने एक खटिया बिस्तर सब कुछ अलग से खरीद कर रखा है वह भी मेहमान के लिए आज आप लोग हमारे मेहमान हैं ‌।

गोरेलाल कि पत्नी के देह के वस्त्र भींगे हुए थे बदन में चिपक गए थें वह ठंड से कांपती रहीं थीं ।

कलमकार:- काकी बगल में ही गुसलखाना है जाइए कपड़े चेंज कर लिजिए ।

उसकि बात खत्म भी नहीं हों पाई थीं तभी गोरेलाल बीच में बोल गया था अपना ही घर हैं हे न पमबी कलमकार तुम्हारे बेटे जैसा है जाओ गुसलखाना में जाकर कपड़े बदल कर आइए और हां वह मेरी मनपसंद मैक्सी पहन कर आना ही ही ही इस बीच उसने दारू के दो क्वाटर निकाल कर जमीं पर रख दिए थे जो वह पहले से ही खरीद कर लाया था हां वह भी भींगा हुआ था उसने अपने कपड़े उतार कर झटककर सूखने को डाल दिए थे ।

पमबी गुसलखाना से मैक्सी पहन जब बाहर निकलीं थीं तब बहुत ही लुभावनी लग रही थी उसकी पारदर्शी मैक्सी से अंतर्वस्त्र दिखाई दे रहे थे योवन उन्मुक्त सागर में हिलोरें मार रहा था कलमकार का उस योवन के अथाह सागर में गोते लगाने का मन कर रहा था ?

उसके उन्मुक्त सीना हिलोरें ले रहा था खुले बाल कमर के नीचे तक लटक रहें थे मुंह कि आभा चांद जैसी खुबसूरती बिखेर रहीं थीं ।

कलमकार :- थोड़े देर तक तो उसके योवन में खोया हुआ था मन ही मन उसे…..

तभी पमबी ने मुस्कुराते हुए कहा कहां खोए हुए हों अरे भाई भींगी हूं हल्की हल्की ठंडी लग रही है चाय पीने का मन कर रहा है और फिर राशन-पानी कहां पर है खाना भी पका देती हूं ।

कलमकार ने रसोई घर में जाकर उसे सारा सामान बताया था इस बीच बार बार वह पम्मी के योवन को निहार रहा था वहीं उसकी इस हरकत पर पम्मी मंद मंद मुस्कान बिखेर रहीं थीं शायद मौन आंमत्रित कर रहीं थीं ।

गोरेलाल आधा क्वाटर गले के अन्दर डकार गया था उसके शिर पर नशा सवार हो गया था तभी तो वह बड बड़ रहा था कि कलमकार मेरे बेटे जैसा है और इस लिहाज से तुम्हरा भी बेटा हुआ है न पम्मी अरे आज़ तों मेरा बेटा भी दो पैग पिएगा।

सलाद कांटी गई थी फिर जाम से जाम टकराव हो रहें थे गोरेलाल के बैग से क्वाटर निकल रहें थे जो खाली हो कर एक और पड़े हुए थे कलमकार को भी नशा हों गया था अब दोनों शराबी आपस में लड़खड़ाती आवाज में बात चीत कर रहे थे ।

कलमकार :- का…. तुम्हारी किस्मत पर हां किस्मत पर मुझे जलन हो रही है ।

गोरेलाल :- क्यों बेटा

कलमकार:- तुम जैसे शराबी को वह भी तुम्हारी बेटी जैसी उम्र कि लड़की जो बला कि हंसी हैं तुम्हें लुगाई मिलीं हैं ।

गोरेलाल:- बीड़ी का कस खींचकर फिर खी खी खी कर लड़खड़ाती आवाज से कहां था मैंने पूरे-पूरे दस हजार रुपए में खरीदा है तेरी काकी को खी खी खी और हां में उसके पेट का पानी भी नहीं हिलने देता वह नाजुक गुड़ीया है जो कि मेरे प्राण हैं प्लांट उसी के नाम पर खरीदा है खी खी खी फिर बंग्ला बन रहा है बंगला अरे भाई सारे जीवन मेहनत कि हैं सरकारी नौकरी हैं पचास एकड़ जमीन पर खेती हों रहीं हैं यह सब कुछ किसका है मेरी पम्मी का

हे न पम्मी ।

कलमकार :- बीड़ी का कश खींचकर पर काका तुम्हारी शादी को पांच साल से ऊपर हों गए हैं अभी तक काकी को मां नहीं बना पाए क्यों ।

दोनों कि बात चीत जो उसी को लेकर चल रही थी इस बीच उस औरत ने खाना पका लिया था वह खाना परोसने के लिए बार बार कह रहीं थीं पर दोनों शराबी तो पैग पर पैग गटक रहें थे ।

कलमकार :-काका तुम मर्द नहीं इसलिए काकी के खेत में बीज नहीं डाल पाएं ।

गोरेलाल :- बेटा वह तों तेरी काकी ही जानती होंगी ही ही ही कि मर्द हूं या नहीं ।

कलमकार ;- एक और पैग गटक कर बोला चलिए आज आप को सिद्ध करना पड़ेगा ।

पम्मी दोनों कि बात चीत का मजा ले रही थी ।

गोरेलाल :- अच्छा एसी बात तब फिर फिर … एसा कहकर वह वही ढेर हो गया था दोनों ने खाना खाने के लिए अनेको बार हिलाया डुलाया था पर वह तों लम्बे लम्बे खर्राटे ले रहा था ।

चूंकि कलमकार पर नशा सवार हो गया था फिर पम्मी को योवन उसे अधखुली आंखों से दिखाई दे रहा था उसने लपककर उसका हाथ पकड़ कर गोदी में उसे खींच लिया था पम्मी यह सब ग़लत है नहीं में एसा नहीं कर सकती वार वार कह रहीं थीं बाहर मेघ धमाचौकड़ी मचा रहें थे दूर कहीं बिजली चमक रही थी गर्जन कि आवाज कानों के पर्दे फाड़ रही थी और कमरे के अंदर दो बदन एक जान हों रहें थें चूड़ियां कि आवाज छन छन छन कर बोल रही थी पाएल के घुंघरू संगीत अलाप रहे थे चूंकि बत्ती जल रही थी तभी गोरेलाल ने उनके और करवट ले कर आंखें खोली थी उन्हें प्रेमालिंगन देखकर वह बड़बड़ाने लगा था जेसै कि अहा मेरी पत्नी कलमकार के साथ नहीं नहीं ऐसा नहीं हों सकता सपना देख रहा हूं मेरी पम्मी एसी नहीं हा हा

उसे जागृत अवस्था में देख कर कलमकार कि दारू का नशा उतर गया था प्रेम सागर में जो वह गोते लगा रहा था उससे बाहर निकल आया था तभी पम्मी ने कहा था रूक क्यों गए

कलमकार :- काका तों जाग रहें हैं

पम्मी :- चिंता मत करो अभी नशें में हैं फिर पति को बोली थी करवट बदल कर सो जाइए तुम्हारे सपने देखने कि आदतें कब सुधरेगी सचमुच वह करबट बदलकर फिर से नाक बजाने लगा था।

फिर वह बोली थी जब नशा उतर जाएगा फिर वह भी सवार हो जाएगा देखने में बुड्ढा लगता है पर तुम से कम नहीं पूरा पस्त कर के रख देता है हमारे बीच उम्र का अंतर फर्क नहीं पड़ता सच कह रही हूं मुझे तुम अच्छे लगते हो मेने ही तुम्हारे कमरे पर रुकने का प्रोग्राम बनाया था अब देखो जल्दी ही हम अपने मकान में रहने आ जाएंगे जहां पर हम बेरोकटोक मिलते-जुलते रहें दोनों चरम सुख के लिए संघर्षरत थें फिर बैग थम गया था परमानंद कि प्राप्ति हो गयी थी ।

जैसा कि गोरेलाल का नशा उतर गया था अब कमरे मे घुप अंधेरा था पर एक बार फिर से चूड़ियां खनखनाती थीं खटिया चर चर कर रहीं थीं कलमकार जाग कर उन आवाजों का आंनद ले रहा था आधे घंटे बाद गोरेलाल कि नाक बजने लगीं थी उसने दुबारा से पम्मी को विस्तर पर खींच लिया था ।

सुवह तीनों ही जाग कर नित्य कर्म से निवृत्त हो कर नाश्ता कर रहे थे रात्रि में क्या हुआ कैसे हुआ जानते हुए भी अनजान थे पर पम्मी के गाल पर दांतों के निशान चुगली कर रहे थे ।

पर पम्मी बहुत बहुत ही खुश दिखाई दे रही थी दोनों को गर्मागर्म इमरती जलेबी जबरदस्ती खिला रहीं थीं उनके बीच नाश्ता के साथ बातचीत भी चल रही थी ।

गोरेलाल :- बेटा कलम अब मकान तों जल्दी ही तैयार हो जाएगा हम यहीं रहने आ जाएंगे सोचता हूं कि तुम्हारे कालेज में पम्मी का दाखिला करा दूं पर फिर एक डर भी हैं अंदर ??

कलमकार:- कैसा डर काका ?

गोरेलाल:- तुम्हें तो पता ही है हमारे बीच उम्र का बहुत लम्बा फासला है कहीं यह गलत राह पर चल न दें ।

पम्मी :- कैसी-कैसी बातें कर रहे हैं आप में आपको प्राण से भी ज्यादा चाहतीं हूं फिर यह बीच में शंकाओं का …आप के साथ हर प्रकार से खुशहाल जीवन जी रही हूं ।

कलमकार:- पम्मी कि और देखकर काका काकी ठीक-ठाक ही कह रहीं हैं आप भले ही अपने आप को उम्रदराज समझ रहे हो पर आप में तो अभी जवान से ज्यादा ऊर्जा हैं ।

गोरेलाल अपनी तारीफ सुनकर खुश हो गया था ।

मकान बनकर तैयार हो गया था गोरेलाल ने कलमकार को भी अपने घर पर रहने के लिए कमरा दे दिया था पम्मी का दाखिला भी कालेज में करा दिया था दोनों ही साइकिल से कालेज आते जाते थे दोनों ही लाइब्रेरी जा कर साहित्य , दर्शन, कि पुस्तकें ला कर पड़ते थे इस बीच कलमकार कविताएं कहानियां लिखने लगा था उसकी रचनाएं लोकल समाचार पत्र में छपने लगीं थी उसकी कविताएं, कहानियां कि सबसे बड़ी पाठक पम्मी ही थीं वहीं आलोचना करतीं वह तारीफ़ करतीं थी

गोरेलाल कि शराब पीने कि लत बड़ गई थी दिन में ही शराब पीने लगा था कलमकार को भी नित्य प्रति पिलाता था शायद कलमकार आदि हों रहा था हालांकि गोरेलाल जान गया था कि कलमकार पम्मी के बीच शारीरिक संबंध हैं पर वह अनजान बन कर रह रहा था हालांकि पम्मी उसकी सेवा में कोई भी कसर नहीं छोड़ ती थीं उसे भी हर प्रकार से संभोग सुख दे रही थी ।

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1 thought on “कलमकार कि आत्म कथा”

  1. लेखक बनना आसान नहीं है उसे कितना त्याग तपस्या करने पड़ती है इसी विषय पर आधारित है यह आत्म कथा ।

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