“हेराफेरी” कविता चितंन.

आत्मा ने मुझसे कहां

तुझे परमात्मा ने क्यों भेजा
पता है तुझे
तुने कितने कितने वादे किए ??
मे तुनक कर बोला
हा मुझे मालूम है
ऊस समय मां के पेट मे था ।

पेशाब मे लथपथ था

गर्भ गृह मे थे बहुत सारे कीड़े
जो थें अल बेले
बिन नख दंत के
काटते थें
बहुत दर्द होता था
पर किसी से कह नहीं सकता था ?
मज़बूरी थी
मुक्ति चाहिए थी
इसलिए कर दिए होगे वादे
अजब गजब निराले
परमात्मा को सारे
पर अब तो मे
मजबूर नहीं
कोई जेल गृभगृह जैसी नही ?
न ही काटते है टिंडे
न ही पडा हूँ
पेशाब टट्टी पर
में आजाद हूं
उड़ता हूं मस्त
गगन मे पंछी कि तरह
घूमता हूं हवाई जहाज पर
जाता हू यूरोप
अमेरिका पाकिस्तान बंगाल देश
और आस्ट्रेलिया इंग्लैंड
करता हू डांस
जवान मधुबाला से
मधुशाला पहुंच कर पिता हूं वियर और शराब
फिर पहुंच जाता है मस्तिष्क सात समुद्र पार
सात लोक
चांद मंगल गृह पर
जहां मुझे खोजना है नया बसेरा
करूगां खेती-बाड़ी
उगाएं गा अनाज
जो भरेगा पेट
लगाऊंगा बाग
फल मिलेंगे अनेकों प्रकार
जिनसे रहेंगे हम जवां
अजर अमर !
फिर खोदेंगे मंगल ग्रह
कि सतह जहां मिलेगा हमें
लोह तत्व सोना चांदी हीरे-जवाहरात फिर खड़े करेंगें
कल पुर्जों का फेक्ट्री का अद्भुत संसार ।
मंगल ग्रह जो धरती से
लाखों लाख मील दूर है
नई होगी पृ्थ्वी
नया होगा आसमान
जहां न होगा तेरा भगवान ??
हम मानव कि होगी अद्भुत रचना !
हम ही होंगे वहां के भगवान
रहूंगा अजर अमर
करुंगा दिन और रात सेक्स फिर होंगी हजारों हजार संतान !
अब आत्मा
तू ही कह
मे क्यों
में क्यों करूं ऊस निष्ठुर
परमात्मा को याद
जो बार बार देता हैं
जन्म
कभी कुत्ते ,बिल्ली, कभी शेर
लोमड़ी
या फिर भैस भैसा
फिर सांप बिच्छू
नेवला केकड़ा
मंगल गृह पर
जाकर जन्म मृत्यु के चंगुल
से मुक्ति पाऊंगा
नया जग बनाऊंगा ।
सहसा आत्मा
फुसफुसा कर बोली
मानती हूं तेरा
इरादा नेक है
कल पुर्जों
का जमाना है
आधुनिक यंत्र है
जो उड़न तश्तरी जैसे
पल भर में
हों जाता है आंखों से ओझल
वे कहलाते है हवाई जहाज
और राकेट केप्सूल ।
पर तुझे नही पता
जहां तू बसने जा रहा है
वहां ओम् कि ध्वनि
निकल रही हैं
उधर भी तेरे कानो में
अद्भुत मधुर संगीत
सुनाई देगा !
तू कहां बच छिपा रह पायेगा
इसलिए कहती हूं
आत्मा परमात्मा एक हे
बाकी सब स्वपन है
अच्छे करम कर
यही चांद मंगल गृह है।।
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