” मैं ठग हूँ ” काका की कविताएं

अर्थ रात थी नींद में था 
सपनों के कि दुनिया में था 
न थी देह कि खबर न हि 
था  व्यापार हानि लाभ का भय 
न था परिवार का गुमान 
पुत्र पत्नी बहू बाबूजी मां का खयाल 
बस था ऐक ही काम आराम आराम ।
सहसा  अंतरात्मा सपने मैं आई थी 
बोली तू ठग है समझें.
मैंने जबाव दिया पगली.  क्यों ऊलजलूल 
बक रहीं है 
तुझे नहीं मालूम  कि तू ही तो मेरे अंदर हैं 
वह  मुस्कुराई बोली पगले मै देती हूँ ऊतर 
मैं हू परमात्मा का अंश 
कुछ ही छणिक मैं आती हूँ  तुझे नहीं मालूम 
मैं हूँ परमात्मा का अंश प़तिबंम 
मुझसे रहां नहीं गया 
पलट कर कहाँ अरे बावली
 क्यों भूल जाती मैं भी तो हूँ 
परमेश्वर का परमाणु 
ऊन्हीने तो मेरी देह मैं अपना 
अणु दान किया है.
जिसे कहते हैं  प्राण
जिसका घर हैं हाढ मांस.
हडडिया कि है नीवं.
पवन पानी से अन्य से 
बना हुआ है घर. 
मांसपेशियों का है परकोटा 
शिर को कहते है  ब्रह्मरंध
जहां रहता हूँ मैं 
फिर बीचोबीच है मेरा सेनापति 
जिसे कहते है ह़दय 
जो धडकनों से कराता है 
मुझे ऐहसास 
कि तू  जिंदा हैं
खैर तू क्या समझ 
मत ऊलझ मुझे बता.
कि मै ठग कैसे हू ??
 अंतरात्मा कान मै फुसफुसाते हुये बोली 
तेरे हाथ में रहता है मानव रचित यंत्र 
जिसे कहते है मोबाइल 
जो हजारों हजार किलोमीटर दूर हो कर 
भी कराता है बात 
फिर कभी कभी अगर तेरा है 
तब हो कर आमनेसामने 
हंसता मुसकरा कर करता है  हलो हाऐ 
मैनै बोला भाई माई 
ईसमे बुरा  क्या है
वह रहस्यमय होकर बोली 
फिर ईधर ऊधर डोली 
  प्रत्युत्तर मै बोली 
तेरा हंसता हुआ चेहरा भोलापन 
बोलना सब नकली हैं 
कुछ भी नहीं है असली 
तेरी पत्नी घर पर देख रहीं थीं बाट 
फिर भी तू सात समुदंर. दूर 
परनारी से कर रहा था बात 
अब तू ही कह अपने आप को ठग 
ऊसके सहीं कहने पर मे डगमगा गया था 
फिर भी मैदान में डटा हुआ था.
साहस कर के  अंतरात्मा
से कहां माई आप है सहीं 
यह मेरा दोहरा मापदंड हैं 
फिर भी मैं ठग नहीं हूं 
पहली गलती हैं सुधार लूगा 
वह बोली. धीर गम्भीर हो गई 
तू ही बता जो तेरे जन्म दाता है.
वहीं तेरे  भाग्य विधाता हैं 
तू  बुढ़ापे में उनका कितना ख्याल रखता है
मैने बोला ठीक है परदेस मैं हूँ 
महगाई का जमाना हैं 
साथ में रखना मुश्किल है 
फिर भी मैं फोन पर हाल चाल जानता रहता हूँ 
ऐसा नहीं कि मैं ऊनहै भूल गया हूँ 
साल दो साल मे घर जाकर  आर्शीवाद
लेकर धन देकर आता हूँ 
वह बोली फिर ईधर ऊधर. डोली 
तेरे बच्चे तेरे लिए है अनमोल 
जिन्हें तू खिलाता है पिज्जा  वरगर
पहनाता हैं हजारों हजार रुपए के कपड़ें 
रखता है ऐ सी के घर मैं 
सकूल भेजता है  कॉन्वेंट
भैजता है ऐ सी कार से 
मैंने कहा हर पिताश्री यहीं 
चाहता है कि  पढ़े-लिखे आगे बढ़े
वह बोली कि आगे कह किवघ
बुढापे कि लाठी बनै 
वह ऐसा कहैगी मुझे मान नहीं था 
मैं गुप चुप था फिर भी साहस करके कहाँ 
हा यहीं तो मै चाहता हूँ.
जबाब मै वह कुछ कठोर लहजे से बोली 
यही तो तेरा दोगलापन हैं 
जब तू जनमा था तेरा बाप था खेतिहर 
मां थी मजदूर 
घर के नाम पर था ऐक छपपर 
जहाँ वारिस मचाती थी ऊतपाद 
तेरी मां हो जाती थी बार बार गीली 
पर तुझे रखती थी सुरक्षित 
कि कहीं लाल को निमोनिया न
हो जाडे मैं तुम्हें औढा देती थी 
बिछौना खुद पर डालकर रखती थी अपनी 
धोती और टाट फटे पुराने कपढे 
और तेरा बाप तुम्हें घूमता था कंधों
पर कभीकभी बनता था घोडा 
जिस पर तू हो कर सवार.
करता था सबारी 
गरीब थे तेरे जनक 
पर तुम्हें नहीं करना दिया ऐहसास 
पहनाऐ अच्छे अच्छे कपढे.
दाखिला दिलाया था अच्छे सकूल 
तेरा जब खरचे का करते थै ईतंजाम 
फिर खुद रहते थे फटेहाल.
पढ लिख कर तू बन गया 
अफसर  जीवन संगनी भी मिली तुम्हें 
आफिसर तू भूल गया ऊनके ऐहसान 
ईसलिए ऊनहै भेजना चाहता है 
 वृद्ध आश्रम 
अब तू ही बता  क्या यह सही है
मे धा  निर उत्तर
घबडाकर मे बोला था 
सपनों से बाहर आया था 
मुझे आ रहै थे  अपने जन्म दाताओं के 
लाचार शरीर देह पर फटेहाल कपड़े 
जो देख रहें थे मेरी बाट 
बेटा आऐगा मुझे साथ ले जाऐगा 
जहां मिलेगा बहू के हाथों का भात 
नाती पोते कहगे दादा दादी.
ऊनकि किलकारियों से गूंज उठ जाऐगा 
घर 
कोई कहेगा दादा जी चंदा मामा कि 
कहानियां सुनाइये 
कोई पकड़ लेगा दादी कि छढी 
खैर मैं ऊन बुढा बुढिया को 
नहीं रखना चाहता था साथ 
कयोंकि मेरी सोसायटी में होता परिहास 
खींच कर  अंतरात्मा से बोला 
तू माई सही कह रहीं है 
मे ही ठग हू ठग हू ।।
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2 thoughts on “” मैं ठग हूँ ” काका की कविताएं”

  1. यह कविता हमारी आपकी अंतरात्मा पर आधारित है हम सार्वजनिक जीवन में धन दौलत कमाने में व्यस्त रहते हैं फिर हम कहीं न कहीं हमारे विचार व्यवहार संकीर्ण मानसिकता से ग्रस्त हो जातें हैं हम अपनी पत्नी बच्चों पर ही ध्यान देते हैं मतलब माता पिता को भूल जाते हैं हम। अपने आप को ठगते हैं इसी विषय पर आधारित है यह कविता ।

  2. यह कविता हमारी आपकी अंतरात्मा पर आधारित है हम सार्वजनिक जीवन में धन दौलत कमाने में व्यस्त रहते हैं फिर हम कहीं न कहीं हमारे विचार व्यवहार संकीर्ण मानसिकता से ग्रस्त हो जातें हैं हम अपनी पत्नी बच्चों पर ही ध्यान देते हैं मतलब माता पिता को भूल जाते हैं हम। अपने आप को ठगते हैं इसी विषय पर आधारित है यह कविता ।

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