लटोरे कि मोटरसाइकिल कर्ज में डूबे परिवार कि कहानी

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यो तो  कार्तिक महीना  किसान के लिए गेहूं कि फसल या फिर सरसों चना आदि के लिए समय के लिहाज से बहुत ही अनुकूल है पर अगर कुछ दिन इधर उधर हो गये तब किसान गया काम से  ऐसे ही महीने मे  अपने खेत पर पत्नी के साथ पिछली फसल के ठूठ खरपतवार इक्कठा करके जला रहा था  दोपहर का समय था आसमां से सूर्य देव अपनी तपिश बिखेर रहे थे  ऊसी के साथ खरपतवार मे लगी आग कि लपेटे भी आसमां छू रही थी  ऐसे ही तपिश भरे समय में लछिया ने अपने मुंह सिर का पसीना अंगोछा से पोंछ कर अपनी अर्धांगिनी लछिया से कहां  लटौरे  नही आया 

धनिया :-  मैंने तो पहले ही मना किया था कि उसे

मोटरसाइकिल मत दिलाओ फाइनेंस कंपनी वाले वार वार किस्त जमा करने के लिए फोन लगा रहे हैं और घर में एक भी रूपए नहीं है ।  

लछिया :- अरे यही तो दिन है  घुम्ने के आज काल तो साइकल कि जगह मोटरसाइकिल ने ले ली है ‌

धनिया :- तुम्हें कोन समझाए पेट्रोल  कितना महंगा हो गया है सारे दिन  फट कर के घूमता-फिरता है 

लछिया:- बच्चा है अभी उसकी उम्र ही क्या है  घूमने दो 

आग कि लपटे आसमां छू रही थी साथ ही काला काला धुआं ऐक कृत्रिम बादल बना रहा था अड़ोस-पड़ोस के किसान भी अपना खरपतवार जला रहे थे धान के खेत थे  उनके  ठूंठों को जला कर ही अगली फसल के लिए खेत तैयार हो रहै थे ‌ मेढ पर आम का पेड़ था दोनों सुस्ताने के लिए दोनों ही  उसकी छांव तले जा बैठे 

धनिया :- कहें देती हूं तुम्हारे लाड़ प्यार में कही लटौरे  हमारी लुटिया न डूबे दे ।

लछिया:- तू भी न क्या ऊल-जलूल सोचती रहती है 

धनिया:- दसवीं कक्षा में फेल हो गया और कहते हो ऊल-जलूल सोचती है 

लछिया :- अरे भाई पढ़ा लिखाकर कोन सा डाक्टर बनाना है मुझे देखो मे ठहरा अनपढ़  फिर भी हिसाब-किताब रखने में बी ऐ पास वाले चकरा जाते हैं ऐसा कहकर उसने अपनी अध  पकी  मूंछों पर ताव दिया फिर बीड़ी  सुलगा कर ऐक लंबा सा कश खींचा धुआं नाक के रास्ते से निकल कर वातावरण में विलीन हो गया था लछीया चालीस साल में चल रहा था सांवला नाटा कद पर चेहरे में ऐक अजीब सी कशिश थी ऊपर से गठीला बदन वही धनिया उसके विपरीत लम्बी  गोरी चिट्ठी बढ़ी बढ़ी कतराई आंखें शुतवा नाक रस भरे होंठों से लबालब चेहरा पैंतीस साल के लगभग उम्र दो बच्चों कि मां होने के बाद भी ज़वानी अंग अंग में झलक रही थी बढ़ा बेटा लटौरे फिर उस कि पीठ पर बेटी रूपा फिर भी उसकी ऐक छलक देखने के लिए अगल बगल के किसान कुछ न कुछ बहाना बना कर चले आते थे कोई गांव के रिश्ते में जेठ लगता था कोई ससुर कोई देवर धनिया सब समझती थी कभी घूंघट निकाल कभी घूंघट डाल कर हंसकर मुस्कान के साथ बातचीत कर  देती थी  खैर बीड़ी का दूसरा लम्बा कश खींचा फिर खी खी खी कर खांसने लगा था 

धनिया:- कितनी बार बोला कि बीड़ी पीना बंद कर लिजिए मानते ही नहीं सीना छलनी छ्लनी हो जाएगा कहे देती हूं ?

लछिया:- खी खी खी कर के यह बीड़ी का पैकेट नकली निकला ससुरे दुकानदार भी बहुत-बहुत बेईमान है नकली माल लाकर बेचते हैं पूरा पच्चीस रुपए का दिया था  सारा बाजार चोर अब देखो हमारी फसल व्यापारी औने पौने भाव मे खरीद कर बीज के लिए चार गुना भाव ज्यादा लेकर हमें ही बेच देते   बीड़ी के कश खींचकर कर मोजूदा व्यापार व्यवस्था पर अपनी राय भी रख रहा इसी बीच पड़ोस का किसान बाला दीन भी आ गया था ।

वाला दीन :- राम राम दद्दा !

लछिया :- राम राम बालू ऐक और बीड़ी जलाईं गयी थी फिर दोनों में बातचीत होने लगी थी धनिया घूंघट डाल कर  ऐक और खिसककर बैठ गई थी ।

बाला दीन:- सूर्य देव कि और देखकर बोला दद्दा यह फसल तो धोखा दे गयी लागत भी नहीं निकलीं है हमारा किसान का क्या होगा ।

लछिया :- हां भाई हमारे जैसे किसान कभी भी धनवान नही बन सकते अब देखो लटोरे के लिए मोटरसाइकिल खरीद कर दीं हैं व्याज सहित एक लाख रूपए में पढ़ेगी पहले ही कर्ज में डूबा था और अब और गले तक डूब गया तेरी भौजी को वहुत समझाया पर कहती हैं पर लड़के कि बात को टाल नहीं सकी उसने अपनी विवशता बताई थी मुझे ख़बर है जब मैंने होश सम्हाला  तब मेरा बाप कर्ज मे था और आज चालीस साल बाद भी मै कर्ज में हूं फिर यह मोटरसाइकिल फाइनेंश कंपनी वाले हर महीने किस्त लेने आ जाते हैं कहा से दूं ।

बाला दीन :-  सब ठीक-ठाक हों जायेगा भैया में हूं न अपने ही तो अपने काम आते हैं  हालांकि क्या बताऊं दद्दा बैक का अलग कर्ज है व साहूकार का अलग बहिन कि शादी में जो भी जमा पूंजी थी उसे लगाकर सवा लाख रूपए का कर्ज माथे पर रखा है अब देखो खाद बीज भी खरीदना है बैक वाले डिफाल्टर घोषित कर रहे हैं कैसे क्या होगा राम जी ही समझें हां ला कि बाला दीन छूठ बोल रहा था वह गांव का सबसे बड़ा किसान था व्याज पर रूपए देता था पर चरित्र के मामले में लम्पट था उसकि लम्पटता सारे गांव में सभी को पता थी कोई भी स्त्री उसे पसंद आ जाती थी तब वह लोभ लालच देकर उसे हासिल करने का प्रयास कर्ता था कहीं कहीं व अपनी नीच हरकत में सफल हो जाता था तब कहीं कहीं उसे मुंह कि खानी पड़ती थी एक दो बार तो उसकी पिटाई भी हों गयी थी अब उसकी नजर धनिया के ऊपर थीं फिर उसे पता था कि यह परिवार कर्ज में डूब गया है ऐसे में पैसा देकर जाल में फस जाएगी ।

लछीया उस के हाव भाव को पहचान रहा था एक दो बार लछीया ने उसे सचेत भी किया था कि यह मेरे उपर डोरे डाल रहा है तब लछीया ने जवाब दिया था ससुरे के पास धन दौलत लगता है ज्यादा हीं है लुटना चाहता है तब लूट लें लटकें छटको से पर खबरदार आगे कूछ .. किया तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा फिर हंसकर कूछ रूपए खैच लें हां ला कि तूं तो वहुत ही चतरी समझदार है समझी जब भी वह आयेगा में कुछ न कुछ वहाना कर के तुझे अकेला छोड़ दिया करूंगा पर रहूंगा आस पास ही गांव में लोग भले ही अनपढ़ हो पर उन्हें कब किससे कैसे काम निकालना है  अच्छी तरह से आता है उन्हें भले ही एम् बी ए कि डिग्री का मालुम नहीं पर अपने स्वार्थ साधने के लिए ऊपर वाले ने उन्हें बिना पैसे कि दी है  अब देखिए धनिया इस डिग्री का कैसा उपयोग करती है ।

 दोनों के बीच वार्तालाप चलता रहा फिर सहसा लछीया कि नजर आग कि कम होती लपटों पर पड़ी थी अंगोछा को शिर पर लपेट कर खेत कि ओर चलता बना बाला दीन ने मोका जानकर धनिया से वार्ता शुरू कि 

बाला दीन :- भोजी कैसी हो

धनिया :- घूंघट मे से मुंह थोड़ा निकाल कर आंखें मटका कर बोली ठीक हूं 

बाला दीन :- ऐक बात कहूं बुरा नहीं मानिए 

धनिया:- हां हां कहिए  

बाला दीन :- दद्दा कि तो लाटरी लग गई तुम्हारी जैसी खुबसूरत बीबी  पाकर 

धनीया :- ओ हो यह  हमें मालूम हीं नहीं था  तब तो दद्दा के पास बहुत पैसा होना चाहिए 

बाला दीन :- पैसा ही सबकुछ नहीं है मनुष्य देह है चार दिन कि जिंदगी है अगर जीवन साथी अच्छा मिले तब समझो जीवन खुशहाल वर्ना बेहाल 

धनीया :- अब समझी मेरी देवरानी पप्पू कि मम्मी अच्छी नही है शायद उसकी काया और मेरी काया में फर्क है 

बाला दीन :- हां पर ना भोजी आप कि बात अलग है कसम से  दौ दौ बच्चों कि अम्मा होकर  अभी आप आठरह वर्ष कि लग रही हों ।

धनिया:- क्या मज़ाक कर रहे हैं देवर जी तुम्हारे भैया तो बुड्ढी बोल रहे हैं  ।

बाला दीन  :-  ही हीं भौजी बन्दर क्या जानें अदरक-लहसुन का स्वाद कसम से रूप ऊपर वाले ने तुम्हें अलग दिया है ओर योवन तो  उफ़ान पर है कसम से अगर एक बार तुम मुझे अपने योवन का दीदार करने दो तब में तुम्हरे चरणों में अपना धन समर्पित कर दूं  ।

धनिया:- न न न देवर जी हम अगर आप का धन दौलत और …. कुछ ले लेंगे तब हमारी देवरानी हमें गाली देंगी न बाबा न में ऐसा नहीं कर सकतीं ।

बाला दीन :- भौजी उसे पता चले तब न वह भी तो मेरे बच्चों कि अम्मा है हीं हीं ही जैसे तुम दादा के बच्चों कि अम्मा हो मेरा मतलब यह है कि तुम कभी-कभार अपने रूप-रंग योवन के अथाह सागर में गोते लगाने दो  तब मेरा तुम्हारा जीवन धन्य हो जाएगा और हां कसम से यह सब हमारे तुम्हारे बीच ही रहेगा किसी भी को कानों-कान खबर भी नहीं होंगी विश्वास रखना हमारी इज्जत ख़राब नहीं होंगी ।

धनिया :- देवर जी जब तुम बार बार अपना प़डय निवेदन रख हीं रहें हों तब सोचना पड़ेगा पर कहें देती हूं अगर कहीं भी तुमने किसीको हमारे रिश्तों के वारे में बताया तब अच्छा नहीं होगा यह हमारे तुम्हारे बीच ही रहेगा अगर तुम खरे उतरे तब हमेशा हमेशा ….. गोते लगाते रहोगे ।

लछीया खेत में खरपतवार जला रहा था चूंकि वह दूर था खेत के आसपास भी कोई नहीं था धनिया ने चारों ओर नज़र घुमाकर अपने घूंघट में से मुखड़ा निकाल कर बाला दीन का मुस्कुरा कर एक मूक निमंत्रण दिया था फिर सीने के ऊपर से साड़ी को हल्का सा अलग किया था जिसमें उसका …. दिखाईं दे रहा था बाला दीन ने पहले उसका यह रंग नहीं देखा था मन ही मन लड्डू खा रहा था ।

धनिया:- कहां खो गए लाला भौजी तुम्हारी है अपनी बड़ी बड़ी आंखें मटका कर बोली थी पर देखना तुम्हारे भैया को ज़रा सा भी शक हुआ तब हम दोनों कि खैर नहीं ??

बाला दीन :- कैसी बात कर रही हों भौजी कसम से मैं दद्दा के गुस्से को पहचानता हूं हांथ पांवों को तोड़ देंगे ?

उसकी आंखों में वासना के डोरे दिखाई देने लगे थे चेहरे पर काइयां पन दिखाई दे रहा था पर उसका यह हाल था जैसे शिकारी शिकार के पास होकर भी शिकार नहीं कर सकता था कारण लछिया नजदीक हीं था फिर धीरे से कहा था कि भौजी जरा सा पल्लू … नीचे खिसका कर .. दर्शन करा दिजिएगा तब ।

धनिया:- धीरज रखिए धीरज दूध गर्म पीने से जीभ जल जाती है मे पूरी तरह से तुम्हारी हूं बस जरा मौके कि तलाश में हूं एक बात कहूं तुम्हारे फायदा कि ही हैं मोटरसाइकिल कि तीन किश्तों को जमा नहीं किया है तुम दस हजार रूपए अगर दें दोगे तब तुम्हारे भैया का टेनसन कम हों जायेगा किस्त वाली कंपनी के कर्मचारी वहुत परेशान कर रहे हैं और अभी पैसा नहीं है साहुकारों का पहले का ही जमा नहीं किया है जेवर भी गिरवी रखा है और हां अगर तुम मदद कर दोगे तब तुम्हरा घर पर आना जाना चलता रहेगा ।

बाला दीन :-  जेब से नोटों कि गड्डी निकाल कर दस हजार कि जगह ज्यादा दे दूंगा अब भला तुम हमारी बन ही गई हो तब तुम्हारे दुःख सुख का ख्याल रखना हमारी जुम्मे दारी है ! पर इतना कह रहा हूं गांव में सभी को पांच रूपए सैकड़ा व्याज लेता हूं वह भी पक्की लिखा-पढ़ी करा कर .

पर तुम से मूल ही वापस लूंगा ब्याज तो तुम देती हीं रहोगी   हीं हीं ही ।

लछिया:- हां हां कह तो दिया देखो भैया आ रहें हैं में उनके सामने पैसों का कहुगी तुम थोड़ी टाल मटोल कर देना हां व्याज का भी कहना ठीक है ।

पटकथा पहले ही पति- पत्नि  लिख चुके थे अब उसमें पात्र अपना अपना रोल निभा रहे थे इंसान का नैतिक मूल्य कितना गिर गया है यह इस पटकथा में नजर आ रहा है दूसरी ओर बाला दीन भी कम नजर नहीं आ रहा था वह मूल धन नहीं छोड़ना चाहता था व्याज के ऐवज में अपनी काम वासना … शांत करने कि ठान चुका था ।

अब लछिया बाला दीन पक्के दोस्त बन गए थे उनकी यह दोस्ती गांव-गांव में चर्चा का विषय बनी हुई थी लोग तरह-तरह के अर्थ निकाल रहे थे कुछ लोगों का कहना था कि लछिया  कर्ज में डूबा हुआ है ऐसे में बाला दीन कि नज़र उसकी जमीन पर हैं तब कुछ लोगों का मानना था कि धनिया और बाला दीन के बीचों-बीच कुछ चल रहा है पर उन्हें किसी भी कि परवाह नहीं थी रोज लछिया के घर पर दारु शराब कि पार्टी चलतीं थीं धनिया चिकन पकाती तब कभी मछली तब कभी मटन बिरयानी इस बीच धनिया ने अपने रूप-रंग योवन से बाला दीन को गुलाम बना दिया था उसने सारे कर्ज चुकाकर मुक्ति पा ली थी लछिया सब जानता था वह खुद ही लटोरे के साथ मोटरसाइकिल से कभी किसी रिश्तेदार के घर जाता तब कभी कहीं और  और घर पर भी रहता तब शराब में मदहोश होकर करवट बदल कर सो जानें का रोल निभाता रहता था धनिया का रंग रूप योवन निखर गया था तन पर नाना प्रकार के जेवर थे कुल मिलाकर बाला दीन का वहुत धन हड़प लिया था इस्को हड़पना तो कहना  ठीक नहीं है क्योंकि उनके बीच जो भी समझोता हुआ था वह बराबरी पर था !

 बाला दीन शराब शबाब में लीन हो गया था गृह कलेश होने लगा था पत्नी बच्चे लड़ने लगे थे उसके निर्णय लेने कि शक्ति कमजोर हो गई थी गांव में जो भी रूपए पैसे ब्याज दर पर थे सभी से लें कर धनिया कि जवानी पर न्योछावर कर दिए थे आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई थी पर उसे परवाह नहीं थी।

उधर लटोरे दुनिया जहान समझने लगा था गांव में तरह तरह कि बातें हो रही थी उसके साथी उस कि मां और बाला दीन के संबंध पर ताने दे रहे थे इन उलाहने के कारण वह परेशान हों गया था मां से पिता से उसने इस संबंध में बात करना चाही थी पर उन्होंने डांट डपट कर उसे शांत कर दिया था चूंकि घर में रोज शराब पार्टी चल रही थी ऐसे वातावरण में उसने भी शराब पीना शुरू कर दिया था वह कभी कभी कहता यह सब तुम लोग ग़लत कर रहे हों समाज में  कैसी-कैसी बातें हो रही है  कुछ तो शर्म करो पर …?

एक दिन लटोरे नशे में चूर हो कर उसी मोटरसाइकिल से सड़क दुघर्टना में गम्भीर घायल हो कर अस्पताल में भर्ती था मां बाप पास में ही थे वह ऊपर जाने के पहले बोला था कि तुम दोनों मेरे जनक थे  ठीक है हम गरीब थे पर हमें दो बकत कि रोटी मिल रही थी फिर तुम सब ने धन दौलत के लिए सब कुछ अर्पण कर दिया  कुछ इज्जत का लिहाज नहीं किया मुझे शर्म आती है कि मैंने तुम्हारे ..  जन्म लिया ? 

डाक्टरों ने बहुत ही कोशिश कि थीं पर लटोरे भगवान के पास चला गया अब धनिया लछिया के पास रोने के सिवा कुछ नहीं बचा था !

कहानी का शारशं यह है कि अनित से कमाया हुआ धन दौलत का परिणाम बच्चों को भुगतना पड़ता है इसलिए मेहनत मजदूरी व्यापार से धन दौलत इकट्ठा करें ।।

समाप्त !!

             

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1 thought on “लटोरे कि मोटरसाइकिल कर्ज में डूबे परिवार कि कहानी”

  1. कहते हैं कि कुछ किसान कर्ज में जन्म लेते हैं व कर्ज में ही मर जाते हैं फिर कर्ज अदा करने के लिए निजी जीवन में बहुत सारे समझोता करना पड़ता है इसी विषय पर आधारित है यह कहानी ।

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