सरहद ग्रामीण संस्कृति किसानो कि कहानी

जून के पहले सप्ताह उमस से भरी हुई गर्मी में घर से बाहर निकलना दुश्वार नजर आता है शहरों में लोग ऐ सी कुलर कि ठंडी-ठंडी हवा में यह तपते मौसम का लुत्फ उठाते हैं उसके विपरीत गांव में किसान ऐसे ही मौसम में अपने अपने खेतों में पारली जलाना देशी खाद डालने का काम करते हैं वर्षा ऋतु आरंभ हो गई थी

मौसम कि पहली बारिश ने दस्तक दे दी थी फिर भी उमस से राहत नहीं मिल रही थी किसानों ने अपने अपने हल बखर बैलों को सजाकर टैक्टर सुधार कर तैयार कर लिए थे दूर दूर तक कृषक अपने अपने खेतों में जुताई कर रहे थे कहीं-कहीं टैक्टर में बंधे डी जी से गाना बजाना कि आवाज आ रही थी कहीं कहीं कोई किसान फाग या लोकगीत गाकर अपना हर्षोल्लास दर्ज कर रहा था चारों तरफ उत्सव का माहौल था पंछी भी इस उत्सव में अपनी-अपनी चहचहाहट से उपस्थित दर्ज कर रहें थे
मंगल ऐक साधारण सा किसान था थोड़ी सी जमीन थी ऊसी को घरवाली बच्चों के साथ बारह महीने कुछ न कुछ फसल सब्जी बोता रहता था मेहनत रंग लाई और देखते ही देखते पक्का मकान मोटरसाइकिल ट्रेक्टर खरीद कर बढ़े किसानों कि फेरहिस्त में शामिल हों गया था दूसरी ओर राम लाल बीस एकड़ जमीन का मालिक था जमीन मालवा थी बेहद ही उपजाऊ पर ऐसी जमीन होने पर भी फसल कि अच्छी पैदावार नहीं ले पा रहा था दो बेटे थे बहुएं थी पर पूरा परिवार आलसी था जब सब कि फसल बुवाई जाती थी तब बाप बेटों को अपनी फसल बुवाई का ध्यान आता था उनके ऊपर यह कहावत सिद्ध होती थी का आषाढ़ का चूका किसान डॉल से चूका बन्दर अर्थात यह कही के भी नहीं रहते परिणाम राम लाल को कम पैदावार मिलती थी दोनों के खेतों कि सरहद साझा थी मंगरू कि लहलहाती फसल देखकर मन ही मन कुढ़ता रहता था और अब तो पक्का मकान मोटरसाइकिल ट्रेक्टर होने के कारण जले में नमक मिर्च का छिड़काव हो रहा था राम लाल मन ही मन उसे नुकसान पहुंचाने का प्लान अनेकों दिनों से बना रहा था आखिर ऐक दिन उसे यह मौका मिल ही गया था मंगल अपनें टैक्टर से खेतों में जुताई कर रहा था कल्टीवेटर का अनेकों जगह मेड़ के अंदर तक छील गया था यह द़शय जैसे ही राम लाल ने देखा था आग बबूला हो गया था टैक्टर के आगे लाठी लेकर खडा हो जाता है
राम लाल :- रूक रूक टैक्टर खड़ा कर लाठी ठोककर कहता है
मंगलु :- क्या बात है भैया टैक्टर बंद करते हुवे
राम लाल:- क्या तूं अंधा हो गया है

मंगरु- नहीं पर हुआ

रामलाल:- मेड़ कि और देखकर मेरी मेड़ को जोतने कि हिम्मत कैसे हुई तेरी
मंगरु :- भैया ड्राइवरी अभी सीखी है मैं ट्रेक्टर चलाने में अभी परिपक्व ड्राईवर नहीं बन पाया गलती हो गई है
राम लाल:- वाह वाह कितने भोले
मंगल :- इसमें भोले पन कि क्या बात है
राम लाल:- तब तुम्हारे बाप कि मेड़ थी
मंगल :- बाप पर मत जाना कहें देते हों बरना अच्छा नहीं होगा ।
राम लाल:- बाह बाह बढ़े लाट साब बन रहें हो ऐक तो चोरी फिर सीनाजोरी टैक्टर कि बोनट पर लाठी मारता हुआ कहता है
मंगल :- में सब कुछ समझ रहा हूं तुम जलते हो तुम लड़ने का बहाना खोजते हो कहें देता हूं लाठी कि मत दिखाना लाठी मुझे भी चलाना आती है ऐसा बोलकर मंगल खेत पर बनी झोपड़ी से लाठी लेकर खडा हो जाता है
ऊन दोनों कि जोरदार बहस को सुनकर दोनों के ही परिवार आमने-सामने लड़ने को डट गए थे लाठी या बरसने लगी थी पत्थर भी बरस रहें थे भद्दी भद्दी गालीयां का आदान-प्रदान किया जा रहा था किसी के सर पर चोट लगी थी तब किसी के हाथ पैर पर कोई रो रहा था तब कोई कराह रहा था छोटी सी मेड़ न हो कर दो राष्ट्रों कि सरहद बन गयी थी दोनों और के योद्धा डटकर मुकाबला कर रहे थे वह तो भला हो गांव वालों का जिन्होंने मध्यस्थता कर के बीच बचाव कर दिया था पर राम लाल कहा मानने बाला था परिवार सहित थाने रोता बिलखता रपट दर्ज करवाने पहुंच गया था उसे थाना जातें हुए देखकर कुछ गांव वालों ने मंगरू को भी रपट दर्ज कराने को कहा था ।

दोनों ही परिवार सहित थाने में बैठे हुए थे पुलिस इंस्पेक्टर वारी वारी से पूछताछ कर रहा था कभी चमकाता कभी धमकाता कभी अश्लील गालियां देता था फिर उसने पहले रामदीन को केविन में अकेला वुलाया था ।
पुलिस इंस्पेक्टर:- जो थुलथुल शरीर का मालिक था चेहरे पर चेचक के दाग-धब्बे थे बड़ी बड़ी मूंछें थीं देखने में ही कुरूप लगता था रिश्वत खोर था!
रामलाल
हां तो राम लाल सच सच बताना वरना खाल में भूसा भर दूंगा समझा ।
रामलाल :- हजूर कहिए !
पुलिस इंस्पेक्टर :- तूने झगड़ा क्यों किया ।
रामलाल :- श्री मान जी उसने मेरी मेड़ जोत ली
पुलिस इंस्पेक्टर:- छूठ बोल रहा है पुलिस से मार मार कर खाल उधेड़ दूंगा तेरी नज़र उसकी लुगाई पर वहुत पहले से ही थीं जब उसने भाव नहीं दिया तो मारपीट पर उतारू हो गया ।
राम लाल :- हजूर कैसी-कैसी बातें बोल रहे हैं आप मे ऐसा नहीं करता सारा गांव गवाह है कि मैंने कभी भी पर स्त्री गमन नहीं किया मेरी भी लुगाई हैं बेटे बहुएं है ।
पुलिस इंस्पेक्टर :- चुप बे अंदर कर दूंगा तुझे तो पता ही है कि बलात्कार के केस में सात साल से पहले जमानत नहीं होती ।
रामलाल:- माइ बाप भगवान गवाह है मैंने एसा नहीं किया ।
पुलिस इंस्पेक्टर :- तूं ऐसा जुर्म कबूल नहीं करेगा फिर आवाज़ देकर मुंशी जी इस को हवालात में बंद कर चार लाठी ….मारो सब उगल देगा ।
रामलाल:- हजूर आप कि शरण में हूं दया किजिए ।
पुलिस इंस्पेक्टर :- हूं हूं तब सोचना पड़ेगा देखो मे मंगल कि लुगाई को समझा दूंगा पर इसकेे लिए तुझे पचास हजार रूपए देना होंगे तेरी खिलाफ लिखीं रपट को फाड़ दूंगा ।
दोनों के बीच तीस हजार रुपए में केश को खत्म करने कि डील हुई थी रामलाल ने लड़के को साहुकार के घर भेजकर ज़मीन गिरवी रख कर पैसा दे दिया था ।
अब मंगल कि बारी आई थी जो दस हजार रुपए में फाइनल हों गयी थी ।
थाने से दोनों ही परिवार गालीया खाकर फिर पैसा देकर वापस गांव आ रहें थे राम लाल से रहा नहीं गया बोला मंगल भैया गलती मेरी ही थीं जो तुम्हारी तरक्की देख कर जल रहा था यह सही है कि तुमने परिवार सहित मेहनत मजदूरी कर तरक्की कर ली है और दूसरी ओर न तों में मेहनत करना चाहता था न ही मेरे बेटे इसलिए गरीब बन गया पर अब मेहनत करूंगा क्योंकि जमीं भी साहुकार से वापस लेनी है भैया तुमने अगर एक दो हाथ मेड़ जोत ली तब जमीं का कुछ भी नहीं बिगड़ा फिर तुम गलती मना भी रहें थे मुझे माफ़ कर दो आज से हमारे तुम्हारे बीच सरहद कि दीवार कभी भी नहीं रहेंगी
दोनों गले मिल गये थे परिवार कि औरतें भी एक दूसरे से लिपट कर माफी मांग रहीं थीं मांग रहीं थीं क्योंकि सरहद खत्म हो गई थी ।।
समाप्त !!
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